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Friday, December 25, 2009

मिथिला की शान राम कृष्ण महाविद्यालय !

मधुबनी मिथिलांचल की हृदयस्थली है और इस ह्रदय में ऐतिहासिक शिक्षा का मंदिर राम कृष्ण कोलेज ( आर के कोलेज) बसता है. १९४० को स्थापित यह महाविद्यालय मिथिला में ही नहीं अपितु बिहार से दूर पुरे भारत सही नेपाल में भी अपनी शिक्षा और प्रसाशन के लिए एक प्रतिष्ठा रखता है.


मिथिला अगर शिक्षा, साहित्य योगदान और बलिदान के लिए जाना जाता है तो इसमें इस विद्या के आले ने हमेशा अपना स्थान रखा है. अंतरस्नातक से लेकर उच्च स्तरीय सभी पढाई के साथ साथ खेलकूद में भी राष्ट्रीय स्टार पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा मिथिला और बिहार को मान देने वाला महाविद्यालय आज किस दशा में है चलिए जानते हैं.




महाविद्यालय प्रवेश द्वार !


मुख्यद्वार से ही महाविद्यालय प्रशाशन और सरकार की बेरुखी दिखने लगती है, जहाँ सितारे जगमग रौशन हुआ करता था अब सन्नाटे ने कब्जा कर लिया है !





प्रसाशनिक भवन !


भवन की चकाचोंघ अब भी है, चटकीले रंग ने महाविद्यालय का मानो चेहरा ही बदल दिया हो, बदलते रंग के साथ पहचान बदलने की कोशिश.





कामर्स भवन 


राम कृष्ण महाविद्यालय पुरे भारतवर्ष और नेपाल में कामर्स की पढाई और इसकी गुणवत्ता के लिए मशहूर रहा है और  कामर्स भवन इसका गवाह.





खेल मैदान 


जी हाँ ये वही मैदान है जिस पर हमारे राम कृष्ण महाविद्यालय ने भारत की सबसे प्रतिष्ठित और लोकप्रिय फूटबाल टीम और अपने ज़माने की नंबर एक मोहन बागान को धुल चटाया था. अपनी ऐतिहासिक प्रतिष्ठा को धुल धूसरित होते हुए भी देख रहा है.





भौतिकी विभाग 


महाविद्यालय का भौतिकी विभाग, जी हाँ ये मेरा भी विभाग रहा है और मेरे इस विभाग ने मिथिला विश्वविद्यालय के भौतिकी विषय में हमेशा अपनी पहचान अगुआ के तौर पर दर्ज कराई है.





विज्ञान भवन 


सम्पूर्ण विज्ञान भवन, विज्ञान विषय से जुडी हुई तमाम पढाई यहाँ होती है मगर बदलते समय में सुविधा के जगह पर अब विभाग के खस्ता हालत में छात्र पलायन करने को मजबूर हैं.




कामन रूम  


छात्र राजनीति और रणनीति को मुकम्मल बनाने में अहम् योगदान, क्या वो कड़ी अब भी जारी है ?




लाइब्रेरी 


जी हाँ पुस्तकों से ज्यादा विचारों के आदान प्रदान ने इस वाचनालय को एक प्रतिष्ठा दी. पुस्तकों के साथ साथ भारत वर्ष की लगभग सभी अखबारों ने यहाँ के छात्रों को बुद्धिजीविता में अगुआ बनाया और जिसकी वजह से छात्र राजनीति से आगे बढने और संघ के सेवाओं में हिस्सेदारी करने में यहाँ के छात्र कभी पीछे नहीं रहे.




खेल कूद विभाग 


महाविद्यालय के खेलकूद विभाग, इसके बिना मानो महाविद्यालय अधूरा हो. क्रिकेट, फूटबाल, टेबल टेनिस, सतरंज,  बैडमिन्टन, एथलेटिक्स के अलावे युवा महोत्सव में विश्विद्यालय के साथ साथ पुरे देश में अपनी छाप छोड़ने में इसी भवन का योगदान है, सारे खिलाडियों का सामूहिक अड्डा.




स्नातकोत्तर विभाग 



महाविद्यालय के शोर शराबे से दूर स्नातकोत्तर विभाग, समय बिता और ढल गयी इसकी जवानी. प्रसाशन (महाविद्यालय और सरकार) की उदासीनता ने मानो इसे मरणासन्न कर दिया हो.


कुछ यादें, कुछ आशाएं
हँसते और रोते हुए वो पल
ख़ुशी आसमान पर जाने की
गमगीन उन यादों से.


बस यादें ही तो हैं.



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Monday, December 21, 2009

नरेंद्र मोदी की गुंडागर्दी !

गुजरात में मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक और फरमान जारी कर दिया, लोगों को अपना वोट डालना ही होगा नहीं तो सजा भुगतने के लिए तैयार हो जाइए. लोकतंत्र में अगर शासक फरमान जारी करने लगे, अपना फैसला आम जनों पर थोपने लगे तो वह लोकतंत्र नहीं अपितु निरंकुश तानाशाह हो जाता है और नरेंद्र मोदी की तानाशाही, निरंकुशता और गुंडागर्दी कोई नयी बात नहीं है. 


आज जब हमारे देश के आम जन गंभीर वित्तीय संकट से गुजर रहे हैं तो ऊपर से सरकारी फरमान मानो जले पे नमक का काम करे. महगाई अपने चरम पर है और लोगों की आमदनी में कोई बढोतरी नहीं और सरकार तरह तरह के बहाने के साथ अपना पल्ला झाड़कर नया फरमान जारी करे तो क्या इसे निरंकुशता नहीं कहेंगे. 


मोदी जी आज लोगों को उनके कर्तव्य की और ध्यान दिलाकर जबरदस्ती मतदान में शामिल करवाने का विधेयक पास करते हैं ऊपर से चेतावनी की अगर मतदान में हिस्सा ना लिय तो कई प्रकार के बंधन जो आपको मिलने वाले सहूलियत से परे करेगा. ना आप लाइसेंस के हकदार होंगे ना सरकारी सुविधा के यहाँ तक कि आप सरकारी नौकरी के लिए भी अयोग्य हो जायेंगे. 


मोदी जी कि योग्यता कि कसौटी से सारा देश वाकिफ है कि महाशय नरेंद्र मोदी राम के नाम पर जातिगत वैमनस्यता फैलाने में सबसे आगे रहे हैं, राम मंदिर बाबरी मस्जिद काण्ड हो या गोधरा, फर्जी एनकाऊंटर का मामला हो या फिर गुजरात में मुसलमानों पर प्रसाशनिक अत्याचार मोदी ने सभी जगह खुल कर गुंडागर्दी मचाई. जी हाँ मोदी जी वो ही नाम हैं जिस मुख्यमंत्री को अमेरिका ने उनके कुकृत्यों के कारण वीसा देने से इनकार कर दिया, जो सभ्य मनुष्य ना बन सका वो भारतीयता का पाठ पढ़ा रहा है, लोकतंत्र के मायने बता रहा है.


लोकतंत्र में सम्पूर्ण मतदान होना चाहिए और इसके लिए प्रशाशनिक व्यवस्था पहले दुरुस्त होनी चाहिए मगर जहाँ निरंकुश शासक हो वहां सिर्फ फरमान ही तो निकलते हैं. 


मतदान के लिए सम्पूर्ण व्यवस्था यानी कि मतदाता सूची सही होनी चाहिए, पहचानपत्र उपलब्ध होनी चाहिए और मतदान के लिए सभी व्यवस्था होनी चाहियी मगर सभी जानते हैं कि अगर मतदाता सूची में नाम है तो पहचानपत्र नहीं, पहचानपत्र है तो मतदाता सूची में नाम नहीं. यदि दोनों है तो अशुधता की कोई जिम्मेवारी नहीं. इसी बहाने आपको मतदान नहीं देने दिया जाता और ये सभी मतदान में हो रहा है. 


बेहतर हो कि मोदी जी राज कर्तव्य को निभाएं (जैसा कि वाजपेयी जी ने कहा था कि इसमें वह असफल रहे हैं) और लोगों के हित के इए राज धर्म पर चलें और आम जनता को रोजी रोटी आवास के साथ इस बदती महगाई से निजात दिलाने पर विचार करें, इस तरह के शिगूफे से आम जन के पेट नहीं भर सकते और ना ही मुद्दे ख़तम हो सकते हैं. 
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Saturday, December 19, 2009

हिंदी ब्लोगर, हिन्दी पत्रकारिता और प्रभाष जोशी !


प्रभाष जोशी नहीं रहे, विगत ५ नवम्बर की रात देहावसान हो गया. प्रभाष जी के देहावसान के साथ ही शुरू हुआ अपने अपने को प्रभाष जोशी का करीबी, शिष्य और जानकार बताने की कवायद.



किसी ने इन्हें इतिहास पुरुष कहा तो किसी ने हिन्दी पत्रकारिता का एक स्तम्भ किसीं ने पत्रकारिता के सभी क्षेत्रों की नब्ज पकड़ने वाला महारथी तो किसी ने खेल या संगीत कि विधा का ज्ञाता. 


वस्तुतः ये तमाम लेखनी प्रभाष जी के प्रति कितनी समर्पित थी ये यक्षप्रश्न ही रह जाएगा क्यूंकि कोई भला क्यूँ अपने दिल की बात जुबान पर लाये. हाँ प्रभाष जी के नाम के साथ अपने अपने कलम के व्यवसाय को चलाने वालों ने प्रभाष जी कि  मौत को बेचने में कोई कसर नहीं छोड़ी. 


बहरहाल में अपने लेख के मुद्दे पर आ जाऊं......


५ नवम्बर को जोशी जी कि मौत हुई और अगले दिन लगभग सभी ब्लोगों पर इस से सम्बंधित ख़बरों की अम्बार थी. बचपन से  जनसत्ता का पाठक और प्रभाष जी की लेखनी को पढने के कारण नि:संदेह मेरा मन भी विचलित हूँ रहा था कुछ लिखने का मगर एक पाठक की तरह सिर्फ पढ़ कर मैंने इस वरिष्ट पत्रकार को श्रद्धांजलि दी. 


सुबह सुबह कम्पूटर पर था तो जितने मित्र जी मेल हो हूँ या याहू, ऑरकुट हो या फेसबुक या फिर फिर ब्लॉग परिवार के मित्र सभी से जोशी जी पर ही विचारों का आदान प्रदान कर रहा था फिर मन में विचार आया कि क्यूँ ना प्रभाष जोशी जी के बारे में गैर पत्रकार हिन्दी ब्लोगर से कुछ बात चीत की जाय. काफी लोगों से बात चीत हुई और तथ्य कम चौंकाने वाले नहीं रहे. 



चिट्ठाजगत हिन्दी ब्लॉग को एक वरीयता देता है इन्ही वरीयता के आधार पर स्टार ब्लोगर कहलाने वाली एक महिला ब्लोगर से बात चीत ने सोचने पर मजबूर कर दिया. नमस्कार होने के उपरान्त मैंने पूछा कि जोशी जी नहीं रहे दुखद दिन है तो उत्तर कि कौन जोशी जी ?


अरे जनसत्ता वाले प्रभाष जोशी का अहले रात निधन हो गया, तो उत्तर अच्छा जनसत्ता के थे मगर मैंने तो नाम नहीं सुना जहाँ जहाँ गयी वहां वहां के हिन्दी अखबार की पाठक रही मगर इस नाम से सर्वथा अपरिचित ही हूँ. 


जी हाँ ये एक ब्लोगर का जवाब नहीं अपितु दर्जनों हिंदी ब्लॉग जगत में अपनी उपस्थिति रखने वाली ब्लोगरों का ये ही जवाब था. फिर कुछ कविता कहानिया यानी की साहित्यिक लेख से सम्बंधित ब्लोगरों की तरफ मुड़ा तो यहाँ भी जवाब में वो ही धाक के तीन पात हाथ में आये मन खिन्न हो उठा. 


माफ़ कीजिये यह खिन्नता इन ब्लोगरों पर नहीं था और ना ही अपने आप पर था तो आखिर था किस पर ? 


जिस तरह से पत्रकारिता से जुड़े हुए ब्लोग्विद, अखबार हो या टीवी पत्रकारिता सब ने प्रभाष जी के ज्ञान का गुणगान किया, हिन्दी और पत्रकारिता में इनके योगदान का वर्णन किया ने मानो प्रभाष जी को एक इतिहास पुरुष बना दिया. आज लोग हिन्दी से कितना प्रेम करते हैं ये अंतर्जाल की गवाही से सिद्ध हो जाता है. पढ़े लिखे लोंगो का हिंदी के प्रति निष्ठा और दायित्व मानो दूर कहीं दिया जल रहा हो और इस बड़े समुदाय में अगर प्रभाष जी जाने माने नहीं थे तो कैसे पत्रकारिता ने प्रभाष जोशी को इतिहाश पुरुष बना दिया ?


कहने की बात नहीं की प्रभाष जी ने पत्रकारिता से अपनी पहचान बनाई, पत्रकारिता को अपने कार्य के दौरान अपनी महत्वाकांक्षा के लिए  उपयोग किया नि:संदेह पत्रकारिता में व्यवसायिकता को घुसाने में अहम् योगदान दिया अपने अंतिम समय में इस व्यवसायिकता के पत्रकारिता पर हावी होने पर आहत जरूर थे मगर इतने नहीं जितने पत्रकारिता के फ़ौज ने जताने की कोशिश की. तहलका के हिन्दी पत्रिका में उनके लेख स्पष्ट कहते हैं की व्यवसायिक होड़ में लेख किस तरह व्यावसायिक था. 


आज मिडिया की गुणवत्ता आम जनों में समाप्त प्राय है, मगर खबर का बाजार हमेशा की तरह सजा हुआ है. देश के खोकले स्तंभों ने इस देश को खोखला किया है और इन्हीं स्तंभों को मिडिया की जरुरत भी. निराला हों या दिनकर, नागार्जुन हों या प्रेमचंद इन सबके साथ अगर किसी को खड़ा करना हो तो हमारी पत्रकारिता किसी को  भी साथ लगा सकती है, किसी को भी हिन्दी के महापुरुषों के श्रेणी में डाल सकती है और ऐसा ही कुछ प्रभाष जोशी के लिए भी किया. 


धन्य है मीडिया.


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Monday, December 14, 2009

माँएं महिला नही होती :- राष्ट्रीय महिला आयोग !

सास बहु के सीरियल हो या इससे जुड़ा हुआ कोई भी सिनेमा खलनाईका माँ को ही बना दिया जाता है। इसी विषय पर बीते दिन दिल्ली से प्रकाशित इंडिया न्यूज़ साप्ताहिक पत्रिका ने कवर स्टोरी किया और कुछ तथ्य सामने लाये जो की शर्मनाक ही नही अपितु राष्ट्रीय महिला आयोग की उपस्थिति पर ही प्रश्न चिन्ह लगा जाता है।

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महिला शोषण हो या उत्पीडन, सीधा आरोपी माँ बन जाती है मानो माँ यानी कि घर घर की खलनायिका और इसी चरित्र को तोड़ते हुए पीड़ित माताएं ने जब बाकायदा संगठन बना कर राष्ट्रीय क़ानून और महिला आयोग के ख़िलाफ़ अपनी आवाज बुलंद की तब जा के पता चला कि महिला का हितैषी बनने वाली महिला आयोग नामक संस्था चंद महिलाओं के हाथों की कठपुतली है जिसे ये रोबदार महिलाएं (गिरिजा व्यास और रेणुका चौधरी सरीखी) अपनी राजनैतिक महात्वाकांक्षा को परवान चढ़ाती हैं।


पत्रिका ने माँ की लडाई को सामने रखा


कुपुत्रो जायेत, कवचीद्वपी कुमाता ना भवति

मगर दुर्गा शप्तशती का ये श्लोक आज के सामाजिक परिदृश्य में फिट नही बैठता, कानून हो या महिला आयोग सबके हिसाब से "कुमाता ही भवति" नि:संदेह हमारी भारतीयता को कलंकित करती है।

आइये कुछ तथ्यों से आगे बढ़ें......


नीना धुलिया आल इंडिया मदर इन ला प्रोटेक्शन फॉरम की अध्यक्ष हैं। पहले ये ब्यूटीशियन थी, विवाहोपरांत अपनी जिम्मेदारी को निभाती हुई सिर्फ़ गृहणी रहीं। घर को संवारते हुए बेटे को पाल पोस कर बड़ा करना और फ़िर अरमान से बहु को घर में लाना। बहु घर में आयी और साथ लायी घर के कलेश। घर के कलेश से लेकर मामला कोर्ट में तलाक तक और आरोपी माँ। नीना जी का दर्द कि माँ की बात ना ही पुलिस सुनता है और ना ही कोर्ट और इसी सोच ने इन्हे इस फॉरम को बनाने की प्रेरणा दी।

पंजाब की स्वर्णलता टीचर थीं। विधवा होने के कारण घर में बस माँ और बेटे। बेटे की शादी धून धाम से की मगर बहु के एच आई वी पोजेटिव होने की बात छुपा कर इन्हे धोखे में रखा गया, इन्होने अपनी गाढ़ी कमाई से बहु का इलाज करवाया। बहु के पिता जेल गए तो उनका जमानत भी डेढ़ लाख रूपये भर कर करवाया। बहु ने इनके ज्वाइंट अकाउंट होने का फायदा उठा कर रिटायर होने के बाद के सारे पैसे निकलवा लिए, बाद में दहेज़ प्रताड़ना के केस। आज पंजाब सरकारी स्कूल की मुखिया मारी मारी फ़िर रहीं है, बेटा घर छोर कर कहीं चला गया और बच गया है बहु की धमकी और पुलिस की प्रताड़ना।

दिल्ली की कंचन ने बड़े प्यार से डी पी एस की शिक्षिका को बहु बना कर घर लाया, बहु ने घर के काम के आलावे सब में रूचि दिखाई और ससुराल के पैसे खरचने में कोई कोताही नही की। कंचन के पति डाइलिसिस पर हैं और चल फ़िर नही सकते सो घर के काम काज में हाथ बटाने को कहना कंचन को महंगा पड़ा। बहु के घर वालों ने घर में धमकी दी, दहेज़ उत्त्पीदन का पुलिस केस किया।

दिल्ली की ही कांता भाटिया की कहानी कंचन से इतर नही जब बहु और घर वालों ने मिल कर बीस लाख रूपये मांगे और ना देने पर दहेज़ उत्पीडन का केस।

किरण कुकरेजा बैंक में कार्यरत हैं और पति भी अच्छे ओहदे पर, बेटे के लिए सॉफ्टवेर इंजीनियर बहु किया। बहु ने सारे जेवर गहने और सामान अपने मैके ले कर गई और चाहती है की पति घर जवाई बन कर रहे, बेटे द्वारा मना करने पर दहेज़ उत्पीडन का मामला और अब ये लोग कोर्ट कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं।

ऎसी ही अनेक व्यथा है जिनमे माताएं ने ना सिर्फ़ अपना एकलौता बेटा गंवाया है अपितु सामजिक सम्मान भी क्यूंकि इन पर बहु उत्त्पीदन का मामला है। पुलिस और कोर्ट इनके ख़िलाफ़ है और तो और महिला के लिए लड़ने वाली राष्ट्रीय महिला आयोग भी बिना तथ्यों को जाने राष्ट्रीय बहु आयोग की भूमिका में होती है।






तो क्या महिलाओं के नाम पर बना आयोग राष्ट्रीय महिला आयोग बहु के लिए एक ढाल है और दहेज़ उत्पीडन बहुओं का हथियार। शातिर महिलाओं के लिए निसंदेह ये ऐसा हथियार है जिसका शिकार होने वाली माएँ अपने घर गंवा चुकी है और बेटे गंवा चुकी है और अब दर दर की ठोकरों के लिए मजबूर है। हालत को देखते हुए जहाँ महिला क़ानून में संसोधन की जरुरत है वहीँ महिला आयोग के कार्य को देखते हुए इसमें भी आमूल चूल बदलाव की जरुरत, और इसी के मद्दे नजर माँएं ने बेंगलुरु में अल इंडिया मदर इन ला प्रोटेक्शन फॉरम को रजिस्टर्ड किया जिसकी शाखाएं आज बेंगलुरु होते हुए दुर्ग, भिलाई, मुंबई, चेन्नई, दिल्ली, लखनऊ सहित ६०० शहरों में पहुँच चुकी है। लोगों में जागरूकता और दहेज़ क़ानून के दुरूपयोग को रोकने के लिए अपनी लडाई को हर छोटे बड़े शहर कस्बे तक ले जाई जा रही है।

फॉरम की अध्यक्षा नीना धुलिया के प्रश्न ही कि क्या माँ महिला नही ये प्रश्न राष्ट्रीय महिला आयोग से और भारत के संविधान और क़ानून से है ?


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Saturday, December 12, 2009

वाटसन स्कूल मधुबनी (एक दर्शन)

मिथिला की हृदयस्थली अगर मधुबनी है तो इसमें कुछ ऎसी जगह है जो मधुबनी को सर्वोच्च बनती है। जिसने मधुबनी को समृद्धता दी, श्रेष्ठता दी और दिया मान सम्मान उनमे नि:संदेह वाटसन स्कूल का नाम सर्वोपरी है।

मधुबनी के अनुमंडलाधिकारी सर वाटसन द्वारा स्थापित वाटसन उच्च विद्यालय ने मधुबनी को कई विभूतियाँ दी है जिन्होंने मिथिला का मान सम्मान शीर्ष पर पहुँचाया है।

चलिए वर्तमान में तस्वीरों से हम इस स्कूल का भ्रमण करें।



स्कूल का प्रवेश द्वार, और स्कूल का नाम !!!

आज भी वाटसन स्कूल के नाम से ही प्रसिद्द इस विद्यालय ने वर्तमान राजनैतिक महत्वाकांक्षा में अपना नाम खोया, नाम बदल कर इसी बहाने द्वार तो बना दिया गया मगर नही हुआ तो स्कूल का भवन विस्तार। जी हाँ आज भी उन्ही चंद कमरों में सभी क्लास लगते हैं।

क्या ये विकास है ?


स्कूल प्रसाशन ने भवन के बजे ईटों से पेड़ का पेड़ जरूर बना दिया मगर जर्जर भवन और जर्जर सड़क अपनी कहानी ख़ुद बयाँ करती है


कभी ये विज्ञान के छात्रों का प्रोग्शाला हुआ करता था, आज भवन चकाचक जो सिर्फ़ बैठकों के काम आता है अर्थात छात्रों के लिए कुछ भी नही


स्कूल का मैदान

इस मैदान में खेल कर मधुबनी के कई खिलाड़ियों ने राष्ट्रीय स्तर पर स्कूल और जिले का नाम रौशन किया, आज यह मैदान रख रखाव के बिना चारागाह बना हुआ है, ना खेल की सुविधा और ना व्यवस्था, अर्थ के नाम पर दूर एक नए भवन को जरूर बना दिया गया ( नि:संदेह ऐसे भवन कमीशन के पर आधारित होते हैं) मगर छात्र सुविधा से कोसो दूर हैं।









ह्रदय द्रवित है क्यूंकि मधुबनी के प्रतिष्ठा की जननी कराह रही है।


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Tuesday, December 8, 2009

मिथिला केर डीह के लsग सय देखू (मधुबनी नगरिया)

पिछुला कड़ी सब में आहाँ सब के मिथिला के डीह मधुबनी भ्रमण पर आहाँ सभ केर घुमाबैत फिराबैत हम आरो फोटो संगे हाजिर छी, लsग सय देखबाक बाद निर्णय करू जे हमर मिथिलाक हृदय मधुबनी में की छुटि गेल आ की आबि गेल,

पहिल कड़ी

दोसर कड़ी

तेसर कड़ी

सरकार बदलल आ लालू के गढ़ रहल मिथिला सय लालू के मटियामेट कय नितीश के पाग पहिरौलक मिथिला मुदा विकाश पुरूष के विकाश केर गप्पबाजी में कतय रहिगेल मिथिला

चलू फोटो सय अपन मधुबनी के देखि कय किच्छु सोचु, माँ मैथिली के लेल किछु करू।


बीच मधुबनी में प्रतिष्ठित सूडी स्कूल, भवने टा थीक, जाहि ठाम राष्ट्रीय स्तर के प्रतियोगिता होइत छल ओही ठाम सन्नाटा मधुबनी के वीरान बनबैत छैक


मधुबनी के शंकर टाकिज सिनेमा मानु मधुबनी के शान थीक


मिथिला टाकिज के बिना मधुबनी नगरिया पुरा नही होयत


मधुबनी केर बस स्टैंड, भीड़ भाड़ के बजाय सन्नाटा



कूड़ा के ढेड पर जगदीश नंदन महाविद्यालय (जे एन कोलेज गेट)


खंडित होइत मिथिला के शान राम कृष्ण महाविद्यालय (आर के कोलेज)


कहियो प्रतिसठाक संग शहर केर कन्या केर शिक्षा दय वाला कन्या माध्यमिक स्कूल के व्यथा जर्जर भवन


मधुबनी प्रसिद्द संकट मोचन मन्दिर


आहाँ सब अपने विचार करू मिथिला के डीह कतय जा रहा छैक.......

मिथिला दर्शन जारी रहत.......
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Saturday, December 5, 2009

स्वाइन फ्लू का प्रकोप और दहशत !!!

पूना में बहुत बहुत से अन्तराष्ट्रीय स्कूल हैं जिसकी वजह से बच्चों का बाहर के देशों से आना जाना लगा रहता है। अगस्त महीने में पूना में जब स्वाइन फ्लू का प्रकोप सामने आया और एक के बाद एक लोंगों की मृत्यु इस बीमारी से होने लगी तो आम नागरिकों के बीच एक दहशत सी फ़ैल गई । सरकार का स्कूल , कॉलेज, सिनेमा घरों एवं शौपिंग मॉल का बंद करना आग में घी का काम कर गया । आम नागरिकों की मनोरंजन गतिविधियाँ जैसे थम सी गई।

इस सब के बावजूद अच्छी बात यह है कि लोंगो में सफाई और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ी । क्या आम जनता को यह ज्ञान है कि उन्हें कौन सी एहतियात बरतनी चाहिए ? सुन लिए मास्क लगाना चाहिए बस दौड़ पड़े मास्क लेने । पूरा शहर यदि जागरूक हुआ तो वह था मास्क के प्रति । मास्क की बिक्री बढ़ गई। कुछ अच्छे ब्रांड की तो काला बाजारी भी होने लगी । हर नुक्कड़ हर दूकान पर मास्क उपलब्ध होने लगा । यहाँ तक कि पान वाले भी मास्क बेचने लगे । घरों और दफ्तरों की साफ़ सफाई करने वाले सफाई कर्मचारी भी मास्क लगाकर काम करने लगे , भले ही उनको इसका ज्ञान न हो कि मास्क क्यों लगाईं जाती है और इसके क्या फायदे हैं ।

दफ्तरों में सफाई पर विशेष ध्यान दिया जाने लगा । डेटोल साबुन एवम सफाई करने वाले अन्य रासायनिक पदार्थों की बिक्री और खर्च बढ़ गई ।

कुछ सप्ताह सारे स्कूल, कॉलेज , सिनेमा घर इत्यादि को बन्द करने का प्रशासन ने आदेश दे दिया और बन्द भी रहे। पर कितने दिनों तक बन्द रहते फिर से खुल गई है और लगा गाड़ी फिर से पटरी पर आ गई । पर स्वाइन फ्लू का दहशत कम नहीं हुआ , डर तो अब तक बनी हुई है । कोई जरा सा छींका नहीं कि लोग उसे घूर कर देखने
लगते हैं । जरा सी सर्दी और बुखार से ही लोग घबरा जाते हैं, चाहे वह साधारण फ्लू ही क्यों न हो । सबके दीमाग में
एक ही बीमारी घूमती है , वह है स्वाइन फ्लू । कहीं यह स्वाइन फ्लू तो नहीं ? सारे स्कूल ,कॉलेज दफ्तर में स्पष्ट हिदायत है जरा सी सर्दी बुखार हो तो न आयें । ऐसा माहौल है पर क्या पूरे शहर के लिए दो ही अस्पताल काफी है जहाँ स्वाइन फ्लू की जांच होती है ? क्या "Tamiflu " हर मरीज़ को उपलब्ध हो पाता है या अब भी समय पर इसकी जाँच की सुविधा पर्याप्त है ?

मुझे एक वरिष्ट डॉक्टर से मिलने का मौका मिला था और मैं उनसे स्वाइन फ्लू के विषय में पूछ बैठी थी । उस समय उन्होंने बताया था , अभी पूरी तरह से यह बीमारी नहीं फैली है , न रोकी जा सकी है । महामारी का अंदेशा अब भी काफी है । आज वह सच साबित हो भी रहा है ठंढ में फ़िर से स्वाइन फ्लू का प्रकोप बढ़ गया है

लेखिका :- कुसुम ठाकुर

साभार :- आर्यावर्त
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Friday, December 4, 2009

आर टी आई पुरस्कार, विवाद और मीडिया !!

बीते दिनों आर टी आई पुरस्कार दे दिए गए, पुरस्कार देने की घोषणा के साथ ही स्थानीय संगठनों , निकायों और मीडिया में इस पुरस्कार को लेकर विशेष अभियान चलाये गए।

सभी मीडिया संस्थान ने चाहे अखबार हो या खबरिया चैनल या फ़िर अंतरजाल मीडिया सभी ने इस से सम्बद्ध अभियान चलाया। कहीं कहीं तो बाकायदा सर्वश्रष्ठ आर टी आई सूचना के लिए पुरस्कार की भी घोषणा की गई थी मगर इन सबमें जो प्रश्न पीछे छुट गया वह ये था की क्या वाकई हमारे देश के सम्बंधित संस्थान, मीडिया, नेता या फ़िर बुद्धिजीवियों की संवेदनशीलता थी या फ़िर इसी बहाने अपने स्वार्थ की सिद्धी ?

नजर तस्वीर पर और संवेदनशीलता भारत के प्रतिष्ठित अखबार हिन्दुस्तान की।


बिहार के झंझारपुर में रिक्शा चालक हैं मोहम्मद मजलूम, आर टी आई कानून के तहत अपने अधिकार को हासिल किया और अपना घर इंदिरा आवास के तहत बनवाया। मोहम्मद मजलूम को प्रसिद्धि मिली, कहीं मीडिया ने तो कहीं संगठन ने सेमीनार कर मजलूम जी की प्रसिद्धि को बेचा, मगर क्या वास्तव में आर टी आई को आम जन तक ले जाने में अपनी भागीदारी निभाई।

पटना से प्रकाशित दैनिक हिन्दुस्तान की ख़बरों के प्रति संवेदनशीलता आप इस तस्वीर से देख सकते हैं जहाँ पुरे भारत के लिए आदर्श मोहम्मद मजलूम की ख़बरों के ऊपर विज्ञापन चेप कर दिखाया है।

आर टी आई को आम जनों तक पहुंचना है, लोगों को उनके अधिकार का पता चलना चाहिए मगर ऎसी हड्कतों से क्या मीडिया अपनी जवाबदेही को निभा रही है।

अनकही चीखें ही तो हैं ये।









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Tuesday, December 1, 2009

योग गुरु बाबा रामदेव का दूसरा रूप (हवाले)

बाबा रामदेव योग गुरु हैं, हमारे देश में बड़ा सम्मान है इनका। योग के माध्यम से पुरे देश को एक सूत्र में पिरोने का बीड़ा उठाया जो कि निसंदेह एक सामाजिक कार्य था, परिणाम भी आशातीत आए और बाबा के शिष्यों का रेला बढ़ने लगा और बाबा की लोकप्रियता भी!

बाबा आसमान पर पहुँच गए क्योंकि इनके शिष्यों की तादाद पुरे देश में अद्भुत रूप से बढ़ी मगर इस भ्रम में कि ये लोगों का हुजूम योग गुरु के लिए है न कि देश के विभिन्न अन्य आयामों के लिए।

योग के माध्यम से बाबा रामदेव ने अकूत संपत्ति बनाई, अपनी औषध कंपनी जिसके व्यापार के लिए रामदेव और उसके शिष्यों ने तमाम हथकंडे अपनाए। जिस औषध कंपनी में बाबा के दवाओं का निर्माण होता है वहां के मजदूरों का शोषण का मामला सामने आया। इस मुड़े को जब वृंदा करात ने उठाया तो तमाम नेताओं के वोट बैक के खतरे ने करात का मुंह बंद करने पर मजबूर कर दिया।

पत्रकारिता भी अपने व्यापार के लिए बाबा का गुणगान करती रही बल्की राष्ट्रीय मुद्दों पर बाबा को शामिल कर इसके महत्वाकांक्षा को हवा दी। चाहे आज तक हो या इंडिया टी वी, जी न्यूज़ या फ़िर स्टार या फ़िर कोई अन्य खबरिया चैनल सभी ने अपनी अनपी टी आर पी के व्यवसाय के लिए राष्ट्रीय अस्मिता पर बाबा को शामिल किया नतीजा बाबा की महत्वाकांक्षा आसमान पर।

बीते दिनों दिल्ली से प्रकाशित इंडिया न्यूज़ साप्ताहिक ने बाकायदा बाबा पर खोजी पत्रकारिता कर तथ्य जुटाए और विस्तार से बाबा की असलियत को सामने लाया, मगर क्या ये कोशिश अमली जमा पहन सका ?

रामदेव विशेष इस अंक का शत प्रतिशत खपत रहा मगर आम जनों के पास नही अपितु बाबा के गुर्गों ने इस पत्रिका को बाजार से ही गायब करवा लोगों को हकीकत से रूबरू होने का रास्ता बंद कर दिया। इस पत्रिका के विशेष को एक ब्लॉग विशेष भड़ास ने तवज्जो से प्रकाशित की और आम लोगों के बीच हकीकत को ले जाने कि भी। ब्लॉग का प्रयास सराहनीय है।

आप भी इस पत्रिका में प्रकाशित ख़बर को पढ़ बाबा रामदेव की हकीकत से रूबरू हो सकते हैं जो कि यहाँ प्रकाशित है।

पहली कड़ी


दूसरी कड़ी


तीसरी कड़ी


चौथी कड़ी

पांचवी कड़ी


ब्लॉग के इस असाधारण कार्य की सराहना करता हूँ और संग ही बधाई देता हूँ पत्रिका के सम्पादक सुधीर सक्सेना जी को संग ही ख़बर इकठ्ठा करने वाली बहादुर पत्रकार वंदन भदौरिया को।


आप भी लिंक से पत्रिका को पढ़ें और अपनी अपनी राय को सामने रखें।

धन्यवाद।










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Friday, November 27, 2009

नितीश ओबामा के विकाश के चार साल पुरे ( समीक्षा)

पिछले कुछ दिनों से बिहार सरकार के सूचना विभाग ने पुरे हिन्दुस्तान के सभी प्रमुख समाचार पत्रों में नितीश जी के चार साल की उपलब्धियों का गुणगान करने में करोड़ों रूपये पानी की तरह बहाने में कोई कंजूसी नही बरती है।
वो राज्य जिसके पास अपने राजस्व बढ़ाने का कोई रास्ता नही है, वो राज्य जो पिछले चार सालों में सिर्फ़ और सिर्फ़ "विशेष राज्य" का दर्ज़ा पाने की गुहार लगाते दिखी, अपने थोड़े से राजस्व का इस कदर दुरूपयोग देख कर ऐसा लगता है कि कहीं नितीश जी का भी हाल "India Shining" campaign के बाद NDA की तरह ना हो जाए....

कमाल की बात है की नगण्य विकास के वावजूद नितीश जी कहते हैं कि "आने वाले समय में बिहार" विकसित राज्यों की श्रेणी में अग्रणी होगा। कैसे? शायद वो अपने राजनैतिक रूप से जागरूक और आर्थिक समझ से परे गरीब जनता को झांसा देने में कामयाब हो जायें परन्तु उनकी बात का कोई सार्थक अर्थ नही दिखता है। एक सरकार जो अपने चुनावी वादोंमें बिहार की सारी बंद पड़ी चीनी मिलों को शुरू करने की बात तो करती है परन्तु जब अमली जामा पहनाने का समय आता है तो कोई कार्य नही हो पाता, सारी चीनी मिलें अभी भी बंद पड़ी हैं..... जब बंद पड़ी उद्योग पर कोई काम ना हो तो नए निवेश की बात बेमानी सी लगती है......

जिस सरकार ने पिछले चार साल में रोज़गार मुहैया कराने के नाम कुछ न किया हो उस राज्य के मुख्यमंत्री का पुरे हिन्दुस्तान में अपने सफलता का ढोल पीटते देख अफ़सोस ही हो सकता है, कोई कुछ कर नही सकता क्यूंकि नितीश जी का autocratic attitude से हर कोई वाकिफ है।

राज्य के प्रमुख सड़कों को अगर छोड़ दिया जाय तो पुरे राज्य भर के सुदूर क्षेत्रों की हालत जस की तस है....... यकीं न हो तो पटना से गया की यात्रा कीजिये (वो क्षेत्र जो नितीश जी के पड़ोस का है) या फ़िर मधुबनी से मधवापुर की यात्रा करें .....आपकी खुस्किस्मती अगर आप सही सलामत अपने प्रियजनों से मिल पाये :-)........

सरकारी अस्पताल में दवाइयाँ अभी भी नदारद मिलेंगी और किसी भी स्कूल में शिक्षक अपने क्लास लेते नही मिलेंगे....(ये नितीश विरोध नही, आंखों देखी वृत्तांत है)


कन्याओं को शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ावा देने वाले नितीश जी ५०० करोड रूपये साइकिल खरीद पर खर्चते हैं (बधाई) परन्तु बिहार के किसी भी विश्वविद्यालय का शिक्षा सत्र अपने समय पर नही है , चाहे पटना विश्विद्यालय हो या मगध या फ़िर बिहार विश्वविद्यालय हो या मिथिला..... २००७ में नामांकित छात्र २००९ तक अपने प्रथम वर्ष की परीक्षा न दें पाये तो स्थिति सचमुच ही भयानक प्रतीत होती है.....

वोट के लिए चंद हज़ार बेरोजगारों को शिक्षक (वो भी अनियमित) बनाने का झांसा देने के अलावे शिक्षा के क्षेत्र में नितीश जी की सरकार ने कुछ भी नही किया जिसपर गर्व से कहा जाए की बिहार की शिक्षा प्रणाली बेहतरीन है.....

आख़िर किस बात पर पीठ थपथपाई जाए या फ़िर नितीश जी कौन सा गुणगान कर रहे हैं समझ से परे है......




साभार :- नजर


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मिथिलाक पाग मधुबनी नगरिया (जारी).....

आहाँ सब पिछुला लेख में मधुबनी घूमि लेलहुं मुदा अखन यात्रा पुरा नही भेल ताहि दुआरे आगू के कड़ी लय कय हम फेर हाजिर छी।

पिछुला कड़ी के आगू बढाबैत बिहार विकाश के झलकी मधुबनी सय देखाबय के कोशिश जारी अई।



मधुबनी रेलवे स्टेशन, बड़ी लाइन भेल मुसाफिर बढ्ला आओर बढ़ल भीड़ मुदा की सुविधा बढल


मधुबनी पुलिस के आरामगाह, मधुबनी थाना


जर्जर ख़राब परल अग्निशमन वाहन, आगि लागि जाय मुदा सहायता नही पहुँचत, विकाश तय थीक


चकचकाई मधुबनी टाउन हाल, बदहाल सहारा में ईहो एक टा मद थीक खजाना लुटाई के लेल


मधुबनी के शक्ति स्थल काली मन्दिर (गंगासागर)


बिना बस के सरकारी बस ठहराव, कहिया होयत परिवहन विभाग के उद्धार


मधुबनी के एक मात्र महिला महाविद्यालय, झुम्मक लाल धर्मप्रिय लाल महिला महाविद्यालय


मधुबनी के स्टेशन चौक परका महावीर मन्दिर, चालू सहभागिता सय मंदिरे केर विकाश कय ली।


पिछला फोटो के लेल अहि लिंक पर जाऊ।

पहिल कड़ी

दोसर कड़ी



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Thursday, November 26, 2009

26/11 का सच, आईने से अलग (नजरिया)

आज २६ नवम्बर यानी कि मुंबई हमले को पुरे साल होने जा रहे हैं, आज ही के दिन हिन्दुस्तान के मुंबई में आतंकियों ने हमला बोला था, और हमारे जवानों और जांबाजों की बदौलत हमने न सिर्फ़ इस हमले को नाकाम किया था अपितु विजय के साथ साथ पुरे भारतवर्ष की एकता और अखंडता भी सामने आयी थी। आज भी हमारे जांबाज तन मन धन के साथ हमारे सरजमीं की हिफाजत के लिए मुस्तैद हैं।


२६/११ यानि कि आतंकी हमला और उस पर फतह मगर हमारे लोकतंत्र के चारो खम्भे (नि:संदेह दीमक खोखले कर चुके हैं इन्हें) का कर्तव्य, दायित्व और निष्ठा ढेरो प्रश्न छोर गया।

सबसे पहले कार्यपालिका......

अपने नाम के अनुरूप ढील ढिलाई और जो युद्ध हम जल्दी समाप्त कर सकते थे उसके लिए हमने जाने गंवई, उन जानों को हम आतंकी के मत्थे नही मढ़ सकते क्यूँकी निर्णय लेने में ढिलाई के करण हुआ हमारा नुकसान इन्ही अकर्मण्य पुलिस, प्रशासन और पदाधिकारियों की देन रहा। चाहे विशेष दस्ते को बुलाने में देरी आदेश में देरी या फ़िर ऐ टी एस चीएफ़ के मदद के बुलावे का बावजूद कम हॉस्पिटल पर मदद न पहुंचना। नेताओं का अपने नाम के मुताबिक़ श्रेय लेना, और स्थानीय मुख्यमंत्री से लेकर गृहमंत्री तक विवादस्पद कार्य और बयान मगर इन सबमें बाजी मारी मीडिया ने।

इस पुरे युद्ध के दौरान मीडिया कि भूमिका आतंकियों के एजेंट के तौर पर ही तो थी जो पल पल कि ख़बर, पल पल कि तस्वीर को जल्दी जल्दी बेचने के चक्कर में भूल गया कि यहाँ तिरंगा कि अस्मिता दांव पर लगी है। इस ख़बर को बेचने के धंधे में लगे हमारे मिडियाकर्मी किसी युद्ध के सिपाही से कम नही लग रहे थे और बाकायदा अपने संस्था के लिए जम कर बाजार बटोरा, जब इन पर नकेल कसने कि तैयारी शुरू हुई तो सबकी कि एक स्वर में हाय तौबा कि ये मीडिया कि आवाज को घोंटना है।

अब जरा आज कि परिदृश्य पर एक नजर डालें, तो हरेक मीडिया चाहे वो खबरिया चैनल हो या अखबार जहाँ इस विजय दिवस को भुनाने में लगा हुआ है वहीँ अपना अपना बड़प्पन आप सभी खबरिया चैनल पर देख सकते हैं।

हमारी आँखे आज नम हैं मगर इसलिए नही कि हम पर हमला हुआ, इसलिए भी नही कि हमारे कई साथी हमारे साथ आज नही हैं अपितु इसलिए कि तिरंगे की हिफाजत करने वालों की शाहदत बरबस हमें गमगीन बना देती है, उनका न होना आंसू का सबब बन जाता है मगर हम गमगीन क्यूँ होयें ?

आज हमारा विजय दिवस है , भले ही कुछ जांबांज हमारे बीच नही हैं मगर तिरंगे की अस्मिता सुरक्षित है और अपने लाडलों पर नाज भी कर रही है। हमारी आँखें नम हैं मगर हम खुश हैं।

अपने विजय दिवस पर आइये शहीदों को याद करें और मातृभूमि के लिए शपथ लें।

जय हिंद

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Monday, November 23, 2009

नितीश विकाश :- पैसे निर्गत सेवा का पता नही !

मधुबनी जिले को गहन चिकित्सा सेवा उपलब्ध कराने के लिए स्वास्थ्य महकमे द्वारा मधुबनी में आईसीयू सेवा शुरू करने की योजना अब तक धरातल पर नहीं उतर पायी है।

सदर
अस्पताल, मधुबनी में आईसीयू सेवा का श्रीगणेश करने हेतु विभाग ने जनवरी 09 ही निर्धारित कर रखा था। उक्त सेवा चालू होने में पहले तो भवन निर्माण एजेंसी बाधक बनी। कारण, समय पर आईसीयू भवन का निर्माण कर स्वास्थ्य विभाग को हस्तगत ही नहीं कराया। लेकिन देर से ही सही जब भवन निर्माण एजेंसी आईसीयू भवन निर्माण कार्य पूरा कर नव निर्मित आईसीयू भवन को स्वास्थ्य महकमा को हस्तगत कर दिया है तो अब उक्त सेवा के चालू होने में डीएमसीएच का निश्चेतना विभाग ही शिथिल पड़ा हुआ है।

गौरतलब है कि सदर अस्पताल मधुबनी में आईसीयू स्थापना हेतु चिकित्सकों एवं पारा मेडिकल स्टाफ के प्रशिक्षण के लिए डीएमसीएच के निश्चेतना विभागाध्यक्ष को दो लाख रुपये जिला स्वास्थ्य समिति के पत्रांक 2130 दिनांक 13.11.08 के द्वारा विमुक्त किया गया था। इस आलोक में महीनों पूर्व चयनित चिकित्सकों पारा मेडिकल स्टाफ ने डीएमसीएच में प्रशिक्षण भी प्राप्त किया। वहीं आईसीयू भवन में उपकरणों का अधिष्ठापन अन्य व्यय के लिए भी डीएमसीएच के निश्चेतना विभागाध्यक्ष को 18 लाख रुपये पत्रांक 2147 दिनांक 17.12.08 के द्वारा विमुक्त किया गया था। लेकिन जिला स्वास्थ्य समिति द्वारा पत्रांक 242 दिनांक 20.02.09 एवं पत्रांक 522 दिनांक 06.04.09 के द्वारा स्मारित करने के बाद भी डीएमसीएच के निश्चेतना विभागाध्यक्ष द्वारा सदर अस्पताल मधुबनी में तो आईसीयू की स्थापना की गयी है और ही उक्त विमुक्त की गयी राशि का उपयोगिता प्रमाण पत्र ही जिला स्वास्थ्य समिति को उपलब्ध कराया गया है।

इधर चिकित्सकों एवं कर्मियों के प्रशिक्षण के बावजूद आईसीयू के उपकरणों का अधिष्ठापन नहीं किये जाने पर जिला स्वास्थ्य समिति ने चिंता व्यक्त किया है। चिंता का विषय यह भी है कि इसी मई माह में वित्तीय वर्ष 2008-09 का अंकेक्षण राज्य स्तरीय दल द्वारा किया जाना है, लेकिन अब उक्त आईसीयू मामले में विमुक्त की गयी 20 लाख रुपये का उपयोगिता प्रमाण पत्र भी जिला स्वास्थ्य समिति को डीएमसीएच के निश्चेतना विभागाध्यक्ष द्वारा उपलब्ध नहीं कराया गया है।



साभार :- आर्यावर्त
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Friday, November 20, 2009

बिहार के क्रिकेटरों का वनवास ख़तम !!

बिहार के क्रिकेट खिलाड़ी अब बी सी सी आई से मान्यता प्राप्त टूर्नामेंटों में भाग ले सकेंगे, सालों के वनवास के बाद बिहार क्रिकेट की वापसी पर प्रान्त के सभी जगहों में हर्ष का वातावरण है।

सालों की जद्दोजहद और राजनीति के पेंच में फंसे बिहार क्रिकेट को पिछले साल ही बी सी सी आई से एसोसिअट सदस्य की मान्यता मिली थी।

आनेवाले सत्र के लिए एसोसिअशन ने अंडर १६ और अंडर १९ टूर्नामेंटों के लिए तैयारी शुरू कर दी है। सालो बाद बिहार इन प्रतियोगिता में शामिल होगा। अंडर १६ की टीम दिसंबर में असम जायेगी जहाँ मणिपुर के साथ दो दो हाथ आजमाएगी जबकी अंडर १९ की टीम रायपुर जायेगी जहाँ छत्तीसगढ़ से भिड़ेगी।

ज्ञात हो की जगमोहन डालमियां के समय ही लालू जी बिहार क्रिकेट एसोसिअशन के अध्यक्ष बने थे और राजनीति के पेंच में उलझा बिहार क्रिकेट एक तीसरे ध्रुव कीर्ती आजाद के कारण ग्रहण का शिकार हो गया। ये ऐसी लडाई साबित हुई जिसने बिहार क्रिकेट को चौपट कर डाला। कीर्ति आजाद ने अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और फायदे के साथ राजनीति के लिए बिहार क्रिकेट को कोर्ट के गलियारे में ले गए जहाँ से बिहार क्रिकेट के नए पौध गलियों में गम हो गए।

बिहार क्रिकेट की नयी वापसी एक शुभ संकेत है और युवाओं के लिए एक रास्ता।

शुभकामना बिहार क्रिकेट एसोसिसशन।




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Wednesday, November 18, 2009

चलू मधुबनी घुमि आबी, (दोसर कड़ी) जारी ........

मधुबनी दर्शन के पहिल भाग अहाँ सब देखलहुं, बदलैत समय में मधुबनी कतेक बदलल केर दर्शन के बाद अओर देखय के लेल भाई लोकनि के आग्रह आयल से ओकर कड़ी हम बढ़ा रहल छी।

मिथिला के विकास अहि फोटो सय स्पष्ट दृष्टिगोचर भय रहल छैक।



मधुबनी नगर पालिका, नगर के दर्शन के बाद एकर औचित्य पर प्रश्न चिन्ह लागि जाइत छैक


मिथिला के पाग, मधुबनी के वाटसन स्कूल, राजनीति पर चढ़ी गेल बलिध्वस्त होइत व्यवस्था के प्रमुख शिकार


गाम सभ में विकाश होई की नही मुदा ग्रामीण विकाश अभिकरण के विकाश स्पष्ट देखि सकैत छी


मधुबनी के बिजली विभाग, पानि में डूबल भवन आर पानीये में डूबल बिजली


जिला भरि सय चुनल प्रतिनिधि के लेल जिला परिषद् , जिला के विकाश नही मुदा हिनकर सब के लेल आलिशान भवन, शायद नितीश जी के लेल हिनकरे विकाश बिहार विकाश थीक


जातिगत राजनीति के बढ़ावा दैत बालिका विद्यालय, जेकर स्थापने शिक्षा के मन्दिर के ध्वस्त करय के लेल कयल गेल।


शिवगंगा बालिका उच्च विद्यालय नेता लोकनि के राजनीति के बलि वेदी पर धीरे धीरे होइत शहीद


सौंसे जिला में केवल मधुबनी समाहरणालय के जगमगाईत देखि सकैत छी, जिला प्रशासन हुए वा राज्य प्रशासन सबके लेल सम्पूर्ण बिहार के समाहरणालय साल दर साल दुधारू गाय बनल रहैत छैक


फोटो तय निमित मात्र थीक मूल में मधुबनी सय अवगत करेनाई छैक।
विचार सय जरूर अवगत कराबी।

पहली कड़ी के लिए यहाँ जाएँ
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